Saturday, 13 June 2020

ध्यान का स्वरूप क्या है?

Question.2 ध्यान का स्वरूप क्या है?

सांख्य दर्शन में मन के निर्विषय होने को ही ध्यान कहा गया है।  आसन की स्थिरता सिद्ध होने पर वह्य इंद्रियां अपने विषयों में प्रचरित होने से अवरुद्ध हो जाती हैं और इसके उपरान्त मन के अवरोध का अवसर आता है। विषयों में अनुराग होने से मन चंचल बना रहता है इंद्रियां अपने विषयों मे प्रवृत्त न भी हो पर मन की गति उस समय भी विषयों के स्मरण में संलग्न रहती है । योगी को आवश्यक है कि मन को  विषय अनुराग से हटाकर आत्मा के चिंतन में लगाएं केवल आत्मा के चिंतन में ही। जब आत्मा के अतिरिक्त समस्त विषयों से हटकर मन आत्मा में एकाग्रता की स्थिति को बनाता है उसी अवस्था का नाम ध्यान है। इसमें मन बाह्य विषयों से सर्वथा रहित हो जाता है। यहाँ केवल आत्म चिंतन निरंतर निर्बाध रूप से चलता है, साधना तथा ध्यान की दृष्टि से यह चित्त की सर्वोत्कृष्ट अवस्था है क्योंकि चित्त का कार्य है किसी विषय का आलंबन लेकर उस पर चिंतन करना इस संबंध में कठोपनिषद ने कहा है  
एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ।
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते।।  (कठोपनिषद)
अर्थात समस्त आलम्बलों में ब्रह्म का आलंबन ही सर्वश्रेष्ठ है जो योगी इस आलंबन को पा लेता है वह ब्रह्मलोक में असीम महिमा को प्राप्त हो जाता है। अर्थात ज्ञानी लोगों , विद्वानों व योगियों के बीच में वह व्यक्ति श्रेष्ठ व्यक्ति कहलाता है और ईश्वर की कृपा का पात्र बन जाता है महर्षि पतंजलि के अनुसार "देश बन्धश्चित्तस्य धारणा" (योग दर्शन 3.1) साधना की सभी विधियों में ध्यान आवश्यक है पतंजलि योग अनुसार यम नियम रूपी महाव्रतो के पालन करने के पश्चात आसन सिद्ध हो जाने पर प्राणायाम के माध्यम से मन व प्राण के सभी फलों का नाश करके, इंद्रियों व मन को अपने-अपने विषयों से समेट कर, उस देश विशेष में ध्यायमान विषय को आलंबन बनाकर ज्ञान की एकाग्रता को ही ध्यान कहते हैं । महर्षि पतंजलि योग दर्शन के अष्टांग योग में ध्यान सातवां महत्वपूर्ण अंग है १ यम,२ नियम,३ आसन,४ प्राणायाम,५ प्रत्याहार पांच योग के बह्यिरंग तथा ६ धारणा,७ ध्यान,८ समाधि यह तीन अंतरंग है। साधना की सभी विधियों में ध्यान अत्यावश्यक है । ध्यान की उत्कृष्ट अवस्था ही योग अंगों में अंतिम समाधि में परिवर्तित हो जाती है। जीवन के आनंद का मार्ग ध्यान से होकर जाता है, परमात्मा तक कोई कभी पहुंचा है तो वह पहली सीढ़ी ध्यान की है। जहां धारणा, ध्यान, समाधि तीनों एकत्र हो जाते हैं  उस स्थिति को आप्त शास्त्रो ने संयम कहा हैं । शास्त्रों में इसे कहा है "त्रैयमेकत्र संयमः", "तज्जया प्रज्ञालोकः"।  जैसे-जैसे संयम स्थिर होता है उसी क्रम में  'समाधिजन्य प्रजा विशारद' अर्थात आत्मा निर्मलतर से निर्मलतम् होती चली जाती है।

ध्यान के लिए कुछ दिशानिर्देश-

▪︎ध्यान करते समय ध्यान को ही सर्वोपरि महत्व दें।
▪︎ध्यान के समय किसी अन्य विचार शुभ-अशुभ से दूर रहें। 
▪︎ध्यान का लक्ष्य ब्रह्म साक्षात्कार ही होना चाहिए।
▪︎ध्यान के समय मनवा इंद्रियों को अंतर्मुखी बनाना चाहिए। 
▪︎साधक को सदा विवेक वैराग्य भाव में रहना चाहिए।
▪︎ध्यान हेतु आहार की शुचिता एवं सात्विकता पर भी मूल रूप से ध्यान देना चाहिए। 

ध्यान के चिकित्सकीय लाभ  (Benefits of meditation)

▪︎ Controlled blood pressure.
▪︎ Better blood circulation.
▪︎ Normalized heart rate.
▪︎ Slower respiration.
▪︎ Less and anxiety, cure migraine problem.
▪︎ Reduced depression.etc.
  
"ध्यान मानव मात्र के लिए शारीरिक व मानसिक, प्राणिक, बौद्धिक, वाचिक, व्यवहारिक तथा आत्मिक रूप से हमें एक नई ऊर्जा, शक्ति, संतोष व सुख देने की पद्धति है। आजकल यद्यपि ध्यान के नाम पर अशास्त्रीय एवं  अवैदिक पद्धतियां भी प्रचलित हैं किंतु वास्तव में ध्यान उसी व्यक्ति का घटित होता है जो व्यक्ति योग के सभी नियमों का तथा अंगों का यथोचित पालन करता है।जिस प्रकार नींद की विधि तो बताई जा सकती है पर अच्छी नींद किसी को दिलाई नहीं जा सकती है यह तो मेहनत और शुभ कर्मो का परिणाम है।"~कुलदीप शिवसोम आर्य 

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