Wednesday, 15 April 2020

योग की परिभाषा (Definition of yoga)

 योग शब्द 'युज समाधौ' धातु में 'घञ्' प्रत्यय लगाने से संपन्न होता है। अतः योग का अर्थ समाधि अर्थात चित्त की वृत्तियों का निरोध है। महर्षि पतंजलि ने अपने योग सूत्र में योग की परिभाषा "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" बतलाई है। जिसका अर्थ चित्त की वृत्तियों का निरूद्ध हो जाना ही योग है।

 विष्णु पुराण के अनुसार
"योगः संयोग इत्युक्त जीवात्म परमात्मने" जीवात्मा और परमात्मा का पूर्णतया मिलन ही योग है।

 श्रीमद्भगवत गीता के अनुसार 
गीता में योग के विभिन्न रूपों का वर्णन किया गया है, परन्तु गीता के अन्यान्य योगों में आपातत: योग के मुख्यत: तीन स्वरूप स्पष्ट दिखते हैं। इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है-
गीता के दूसरे अध्याय में योग के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा है कि
‘‘समत्त्वं योग उच्यते’’। गीता 2/48 
अर्थात् जब साधक का चित्त सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होता है, तब इस अवस्था में साधक का चित्त सुख-दु:ख, मान-अपमान, लाभ-हानि, जय-पराजय, शीत-उष्ण, तथा भूख-प्यास आदि द्वन्द्व में समान बना रहता है। इस अवस्था में साधक सभी पदार्थों में समान भाव रखता है। इस अवस्था के कारण उसका अज्ञान नष्ट हो जाता है, सभी दु:ख समाप्त हो जाते हैं। इसी समत्त्व भाव का नाम योग है।
गीता के दूसरे अध्याय में ही योग की एक अन्य परिभाषा देते हुए भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं- 
‘‘ योग: कर्मसु कौशलम्’’। गीता 2/50 
इस कथन का अभिप्राय है फलासक्ति का त्याग करके कर्म करना ही कर्मकौशल है। कर्म करते हुए यदि कर्त्ता कर्म में आसक्त हो गया तो वह कर्मकौशल नहीं कहलाता है।
कर्त्ता की कुशलता तो यह है कि कर्म करके उसको वहीं छोड़ दिया जाये। हानि और लाभ, जय अथवा पराजय, कार्य-सिद्धि या असिद्धि के विषय में चिन्ता ही न की जाये। कर्म करते हुए यदि कर्त्ता उस कर्म का दास होकर रह गया तो वह कर्त्ता का अस्वातन्त्रय हुआ। कर्त्ता तो स्वतन्त्र हुआ करता है।

महात्मा बुद्ध के अनुसार
"कुशल चितैग्गता योगः" कुशल चित्त की एकाग्रता ही योग  है।

 योग वशिष्ठ के अनुसार
योग वशिष्ठ में भी योग के विभिन्न स्वरूप जैसे- चित्तवृत्ति, यम-स्वरूप, नियम-स्वरूप, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, समाधि, मोक्ष आदि का वर्णन वृहद् रूप में किया गया है।
योग वशिष्ठ के निर्वाण-प्रकरण में वशिष्ठ मुनि श्री राम जी को योग के स्वरूप के बारे में वर्णन करते हुए कहते हैं कि संसार सागर से पार होने की युक्ति का नाम योग है।

 महर्षि वेदव्यास के अनुसार
 "योग: समाधि:" योग समाधि है, जिस अवस्था में आत्मज्ञान की प्राप्ति हो वही योग है।

Yoga is a physical exercise. The fact is that yoga is a Holistic discipline. It can be considered a means of balancing and harmonizing the body, spirit & mind. W.H.O.

8 comments:

  1. Ati sunder , kafi logo ko labh milega apke blog se

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    1. आने वाले दिनों में इस Blog मे योग के सम्बन्ध में बहुत ही रोचक जानकारियाँ उपलब्ध होगी।

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  2. Relevant information about Definition

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  3. Please update some more information in detail

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  4. good lines. your information is very clear. 🙇. namaste friend.
    by the way good photos. I the author hahaha

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