Saturday, 13 June 2020

कपालभाति की विधि, लाभ व सावधानियो की चर्चा कीजिए।

Question.4 कपालभाति की विधि, लाभ व सावधानियो की चर्चा कीजिए। 


कपालभाति की विधि :-
 किसी भी ध्यानात्मक अवस्था सुखासन, पद्मासन या वज्रासन लगाकर बैठे, दोनों हाथ ध्यान मुद्रा ,ज्ञान मुद्रा में या दोनों हाथों से हम घुटने भी पकड़ सकते हैं, नेत्र कोमलता से बंद, कमर एवं गर्दन सीधी ,चेहरे पर प्रसन्नता का भाव ,शक्ति पूर्वक  स्वासो को नासिका के द्वारा बार-बार बाहर फेंकते जाएं ।
प्रयास पूर्वक श्वास नहीं लेना है, स्वास  स्वत:ही अंदर जाएगी। स्वास को बाहर फेंकने के साथ-साथ पेढू को रीढ़ की ओर बारंबार आकर्षित करें। एक सेकंड में एक बार श्वास को लय के साथ फेंकना एवं सहज रूप से धारण करना चाहिए। इस प्रकार आदर्श स्थिति में बिना रुके 1 मिनट में 60 बार तथा 5 मिनट में 300 बार कपालभाति प्राणायाम होता है। अपनी शक्ति और सामर्थ्य अनुसार संख्या कम या अधिक हो सकती है ,आसन प्राणायाम करते समय अपने शरीर या सांसों के साथ बिल्कुल भी खिलवाड़ ना करें।

कपालभांति के लाभ :-
1.शरीर में स्थित 20 प्रकार के कफ रोग पूर्णत: विनष्ट हो जाते हैं।
2.मस्तिष्क और मुखमंडल पर  आभा ,ओज एवं तेज बढ़ता है।
3.कैंसर ,एड्स ,मधुमेह ,डिप्रेशन, हेपेटाइटिस ,सफेद दाग, सोरायसिस ,अत्यधिक मोटापा, इनफर्टिलिटी आदि मे लाभ होता है ।
4.फेफड़ों में रुकी हुई वायु जो साधारणतया बाहर नहीं निकलती वह भी बाहर निकल जाती है, उसके स्थान पर ऑक्सीजन श्वास द्वारा अंदर जाकर रक्त शोधन क्रिया को तीव्र बनाती है। रक्त भ्रमण भी सामान्य रूप से होने लगता है ।
5.श्वसन प्रणाली एवं नासिका द्वारों का भी शोधन होता है तथा श्वास नलिकाए लचीली बनती हैं, फलत: समग्र  श्वसन प्रणाली  स्वस्थ होकर अच्छा कार्य करती है।
6.विचार शक्ति ,स्मरण  शक्ति को बढ़ाने की इसमें अद्भुत क्षमता है।
7. उद्विग्न मन शांत होता है।
8.समस्त  कफ रोग दमा ,श्वास, एलर्जी ,साइनस आदि रोग नष्ट हो जाते हैं।
9. ह्रदय, फेफड़ा एवं मस्तिष्क के समस्त रोग दूर होते हैं।
10. मोटापा ,मधुमेह ,गैस ,कब्ज, अम्लपित्त ,किडनी तथा  प्रोस्टेट से संबंधित सभी रोग ,पेट आदि  बढ़ा हुआ भार, हृदय की धमनियों में आए हुए विरोध दूर होते हैं।
11. मन स्थिर, शांत तथा प्रसन्न रहता है ।नकारात्मक विचार नष्ट हो जाते हैं जिससे डिप्रेशन आदि रोगों से छुटकारा मिलता है।
12. अमाशय, अग्नाशय ,यकृत, प्लीहा, प्रोस्टेट एवं किडनी का आरोग्य विशेष रूप से बढ़ता है।
13. पेट के लिए बहुत से आसन करने पर भी जो लाभ नहीं हो पाता मात्र कपालभाति प्राणायाम के करने से ही सब आसनों से भी अधिक लाभ हो जाता है ।
14.दुर्बल आंतों को सबल  बनाने के लिए भी यह प्राणायाम सर्वोत्तम है।

 विशेष सावधानी :-
 1.पेट की शल्यक्रिया के लगभग 3 से 6 महीने के बाद ही इसका अभ्यास किसी योग्य योगाचार्य तथा डॉक्टर के परामर्श के बाद ही करें।
2. गर्भावस्था ,अल्सर ,हर्निया, नकसीर, माइग्रेन, चक्कर आना, मिर्गी ,आंतरिक  रक्तस्राव एवं मासिक धर्म की अवस्था में इस प्राणायाम का अभ्यास ना करें ।
3.ह्रदय रोगी तथा उच्च रक्तचाप से ग्रसित रोगियों को यह प्राणायाम नहीं करना चाहिए।

योग क्या है ? विस्तृत चर्चा कीजिए।

Question.3 योग क्या है ? विस्तृत चर्चा कीजिए।

गीता में योग की परिभाषा 
योगःकर्मसु कौशलम् (2-50) की गयी है । दूसरी परिभाषा समत्वं योग उच्यते (2-48) है । कर्म की कुशलता और समता को इन परिभाषाओं में योग बताया गया है । पातंजलि योग दर्शन में योगश्चिय वृत्ति निरोधः (1-1) चित्त की वृत्तियों के निरोध को योग कहा गया है । इन परिभाषाओं पर विचार करने से योग कोई ऐसी रहस्यमय या अतिवादी वस्तु नही रह जाती कि जिसका उपयोग सवर्साधारण द्वारा न हो सके । दो वस्तुओं के मिलने को योग कहते हैं । पृथकता वियोग है और सम्मिलन योग है । आत्मा का सम्बन्ध परमात्मा से जोड़ना योग होता है ।
जीवत्म परमात्म संयोगो योगः कहकर भगवान याज्ञवल्क्य ने जिस योग की विवेचना की वह केवल कल्पना नहीं, अपितु हमारे दैनिक जीवन की एक अनुभूत साधना है और एक ऐसा उपाय है जिसके द्वारा हम अपने साधारण मानसिक क्लेशों एवं जीवन की अन्यान्य कठिनाइयों का बहुत सुविधापूर्वक निराकरण कर सकते हैं । हमारे अन्दर मृग के कस्तूरी के समान रहने वाली जीवात्मा एक ओर मन की चंचल चित्तवृत्तियों द्वारा उसे ओर खींची जाती है और दूसरी ओर परमात्मा उसे अपनी ओर बुलाता है । इन्हीं दोनों रज्जुओं से बँध कर निरन्तर काल के झूले में झूलने वाली जीवात्मा चिर काल तक कर्म कलापों में रत रहती है । यह जानते हुए भी कि जीवात्मा दोनों को एक साथ नहीं पा सकती और एक को खोकर ही दूसरे को पा सकना सम्भव है वह दोनों की ही खींचतान की द्विविधा में पड़ी रहती है । इसी द्विविधा द्वारा उत्पन्न संघर्षो को संकलन समाज और समाजों का सम्पादन विश्व कहलाता है ।
उर्पयुक्त विवेचना का एक दूसरा स्वरूप भी है और वह यह है कि जीवात्मा और परमात्मा के बीच मन बाधक के रूप में आकर उपस्थित होता है । कुरुक्षेत्र में पार्थ ने मन की इस सत्ता से भयभीत होकर ही प्रार्थना की थी चंचलं हि मनः कृष्ण  प्रमाथि बलदृढ़म् । मन मनुष्य को वासना की ओर खींचकर क्रमशःउसे परमात्मा से दूर करता जाता है । उसे सीमित करना पवन को बन्धन में लाने के समान ही दुष्कर है । आत्मा और परमात्मा के निकट आये बिना आनन्द का अनुभव नहीं होता । ज्यों-ज्यों जीवात्मा मन से सन्निकटता प्राप्त करती जाती है वह क्लेश एवं संघर्षों से लिपटती जाती । आत्मा का एकाकार ही परमानन्द की स्थिति है । सन्त कबीर ने इस एकाकार को ही आध्यात्मिक विवाह का रूप दिया है और गाया है।
जिस डर से सब जग डरे, मेरे मन आनन्द ।
कब भारिहों कब पाइहों पूरन परमानन्द ॥
मन को वश में करने की मुक्ति ही योग है । महर्षि पातंजलि ने कहा भी है-योगश्चित्त वृत्ति निरोधः । चित्तवृत्ति के निरोध से ही योग की उत्पत्ति की उत्पत्ति होती है और इसी को प्राप्ति ही योग का लक्ष है । गीता में भगवान कृष्ण ने योग की महत्ता बतलाते हुए कहा है कि यद्यपि मन चंचल है फिर भी योगाभ्यास तथा उसके द्वारा उत्पन्न वैराग्य द्वारा उसे वश में किया जा सकता है ।
व्यावहारिक रूप से योग का तात्पर्य होता है जोड़ना या बाँधना । जिस प्रकार घोड़े को एक स्थान पर बाँधकर उसकी चपलता को नष्ट कर दिया जाता है उसी प्रकार योग द्वारा मन को सीमित किया जा सकता है । विस्तार पाकर मन आत्मा को अच्छादित न करले इसलिए योग की सहायता आवश्यक भी हो जाती हे । भक्तियोग और राजयोग से ऊपर उठाकर त्रिकालयोग के दर्शन होते हैं और यही सर्वश्रेष्ठ योग है ।
इन्हीं तीनों योगों का व्यावहारिक साधारणीकरण कर्मयोग है और आज के संघर्षमय युग में कर्मयोग ही सबसे पुण्य साधना है ।
संसार और उसकी यथार्थता ही कर्मयोगी का कार्य क्षेत्र है । फल के प्रति उदासिन रहकर कर्म के प्रति जागरूक होकर ही मनुष्य क्रमशः मन पर विजय पाता है और परमात्मा से अपना सम्बन्ध सुदृढ़ करता है । कर्मयोग की प्रेरणा किसी कर्मयोगी के जीवन को आदर्श मानकर ही प्राप्त होती है । अपने कर्तव्य के प्रति तल्लीनता तथा विषय जन्य भावनाओं के प्रति निराशक्ति ही कर्मयोग की पहली सीढ़ी है ।
कर्मयोगी के जीवन में निराशा अथवा असफलता के लिए कोई स्थान नहीं क्योंकि एक तो वह इनकी सत्ता ही स्वीकार नहीं करता और दूसरे उसकी दृष्टि कर्म से उठकर परिणाम तक पहुँच ही नहीं पाती । यहाँ तक की सच्चा कर्मयोगी परमात्मा की प्राप्ति के प्रति भी बीत राग हो जाता है । उस स्थिति पर तस्माद्योगी भवाजुर्न के अनुसार कर्मयोगी वह पद प्राप्त कर लेता है जहाँ मैं तुमसे हूँ एक, एक हैं जैसे रश्मि प्रकाश के रूप में आत्मा और परमात्मा में कोई अन्तर नहीं रह जाता ।
योग शब्द का अर्थ-क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है । जिस योग का जो विशेष अर्थ उद्देश्य होता है, उसका संकेत करने वाला शब्द आगे जोड़ दिया जाता है । जैसे भक्तियोग का अर्थ है-ब्रह्मसत्ता,भक्तिभाव से जुड़े रहने की जीवन पद्धति । ज्ञानयोग का अर्थ है-ज्ञान साधना द्वारा सर्वव्यापी सत्ता की अखण्ड अनुभूति । मन्त्रयोग अर्थात मन्त्र जप द्वारा आत्म चेतना का ब्रह्म चेतना से समरसत्ता प्राप्त करने का प्रयास । कर्मयोग को प्रखर कर्मनिष्ठा एक जीवन साधना कहा गया है । हठयोग यानी पूर्ण स्वास्थता के लिए की जाने वाली विशिष्ट शारीरिक मानसिक क्रियाओं का साग्रह अभ्यास ।

भगवद्गीता में योग और योगी के स्वरूप का जहाँ कहीं भी उल्लेख हुआ है, वही योग के ऐसे ही लक्षणों का संकेत-निर्देश हुआ है, जो आत्मचेतना की ब्रह्मचेतना से जोड़ने पर आनन्द-उल्लास सक्रियता-स्फूत, कर्मनिष्ठा-चरित्रनिष्ठा के रूप में प्रत्यक्ष देखे जाते हैं । साधक के व्यक्तित्व में उस प्रकाश की ये अभिव्यक्तियाँ ही योग सफलता के चिन्ह हैं । इसी तथ्य को गीता में भिन्न-भिन्न ढंग से प्रतिपादित किया गया है, यथा-समत्वं योग उच्यते, अर्थात समत्व बुद्धि सुसन्तुलित मनःस्थिति ही योग है । योग संन्यस्त कर्माम् अर्थात संन्यस्त भाव से निलप्त एवं उत्साहपूर्ण रहकर काम करना योग है ईक्षते योग युक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनम् -समदर्शी बुद्धि से सर्वत्र परमात्मा को देखने वाले व्यक्ति योग युक्त होते हैं ।

योगः कर्मसु कौशलम्-कर्म-कौशल या उत्कृष्ट कर्मनिष्ठा ही योग है । योगिनः कर्म कुर्वन्ति संग त्यक्तत्वात्मशुद्धये-योगी वह है जो आत्माशुद्धि के लिए मोहासक्ति छोड़कर कर्म करता है । नैव किंचित्करोमीति युक्ति मन्येत तत्ववित् तत्ववेत्ता जानता है कि आत्मासत्ता स्वयं स्थूल कर्म नहीं करती, कर्म तो इन्द्रियादिक द्वारा आत्मचेतना की उपस्थिति में सम्पन्न हो रहे हैं अतः उनमें सफलता विफलता से असन्तुलित हो उठने जैसे कोई बात नहीं । योगयुक्तो विशुद्धात्मा-योगयुक्त व्यक्ति की आत्मसत्ता विशुद्ध प्रखर हो जाती है । 
जब हम दुःखमय दुनिया में बहुत दुःखी हो जाते हैं और प्रभू से मिलने की सत्य उत्कण्ठा हमारे मन में उत्पन्न होती है और हम प्रयत्न करके अपने मन-मन्दिर हृदयाकाश में उस प्यारे को विराजमान देखते हैं और समस्त संसार की सामग्री की सुधबुध अपने मन से भुला देते हैं, तब हमको अपने अन्तःकरण में उस विभु के विराजमान होने का ज्ञान होता है और चक्षु से अपने आत्माराम के समक्ष जाज्वल्यमान देखते हैं उसका नाम योग है ।
योग के विषय को लोगों ने ऐसा जटिल बना रखा है कि इसका नाम ही भयंकर हो गया है । योग शब्द से केवल हठयोग-केवल आसन, मुद्रा आदि का जटिल विषय है, दूसरे इन शारीरिक क्रियाओं से आध्यात्मिक लाभ क्या है और कहाँ तक हो सकता है सो भी समझना कठिन है । बात तो यों है कि अभ्यासात्मक योग के सब तत्वों को विचार करने से इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि हठयोग यद्यपि योग का अंग अवश्य है, पर जो भी वह केवल एक अंग है, स्वयं योग नहीं । अर्थात वह योग का एक साधन मात्र है और सो भी प्रधान नहीं ।
ऐसे अंग योग के आठ कहे गए हैं- (1) यम,(2) नियम,(3) आसन, (4) प्राणायाम,(5) प्रत्याहार,  (6)  धारण,(7) ध्यान ,(8) समाधि 
 ये पाँच योग के बाह्य अंग हैं बाकी तीन अन्तरग (योगभ्यास 3/1) ये तीन हैं धारण, ध्यान, समाधि।ये ही तीन प्रधान हैं।कारण यह है कि ये ही तीन प्रक्रियाएँ जरूरी हैं जिनका उपयोग सब कार्यों में होता है । जब किसी ज्ञान की प्राप्ति की इच्छा हो तो उसके लिए जब ये तीनों लगायी जाती हैं तभी वह ज्ञान उचित रूप में प्राप्त होता है । जब तक ज्ञेय पदार्थ पर मन एकाग्र रूपेण नहीं लगाया जाता तब तक उसका ज्ञान असम्भव है । इसलिए प्रथम श्रेणी हुई यही एकाग्रता, जिसे धारणा कहा है (सू. 3-1), इसके बाद जब मन बहुत काल तक इसी प्रकार एकाग्र रहे तो यह हुआ ध्यान (सू.3-2) और जब मन इस ध्यान में इस तरह मग्न हो जाय कि ध्येय पदार्थ में लय हो गया तो यही हुई समाधि (सू.3-3) । किसी कार्य के सम्पन्न होने में तीनों की ही आवश्यकता होती है । यह केवल आध्यात्मिक अभ्यास या ज्ञान के ही लिए आवश्यक नहीं हैं, प्रत्येक कार्य के लिए इनका होना अनिवार्य है । कोई भी कार्य हो जब तक उसमें मन नहीं लगाया जाता,कार्य सिद्ध नहीं होता । इसी मन लगाने को धारण, ध्यान, समाधि कहते हैं । ये तीनों एक ही प्रक्रिया के अंग हैं । इसी से इन तीनों का एक साधारण नाम संयम गया है (सू. 3-4) । इसी संयम अर्थात धारण, ध्यान, समाधि से ज्ञान की शुद्धि होती है । योग-सूत्रों में इन उपदेशों को जब हम मामूली कामों में लगाते हैं और इनके द्वारा सफलता प्राप्त करते हैं, तब हमको मानना पड़ता है कि योग का सबसे उत्कृष्ट और उपयोगी लक्षण वही है जो भगवान ने कहा है- योगः कर्मसु कौशलम् इस योग के अभ्यास के लिए प्रत्येक मनुष्य को सदा तैयार रहना चाहिए । गुरु मिलें तब तो योगाभ्यास करें ऐसे आलस्य के विचार निर्मला हैं । जो कोई कर्तव्य सामने आ जाय उसमें संयम (अर्थात धारण, ध्यान, समाधि) पूर्वक लग जाना ही योग है । इसमें यदि कोई स्वार्थ कामना हुई तो यह योग अधम श्रेणी का हुआ और यदि निष्काम है-कर्तव्य बुद्धि से किया गया है और फल जो कुछ हो ईश्वर को अर्पित है तो यही योग उच्चकोटि का हुआ । जब अपने सभी काम इसी रीति से किए जाते हैं तो वही आदमी जीवन्मुक्त कहलाता है ।

ध्यान का स्वरूप क्या है?

Question.2 ध्यान का स्वरूप क्या है?

सांख्य दर्शन में मन के निर्विषय होने को ही ध्यान कहा गया है।  आसन की स्थिरता सिद्ध होने पर वह्य इंद्रियां अपने विषयों में प्रचरित होने से अवरुद्ध हो जाती हैं और इसके उपरान्त मन के अवरोध का अवसर आता है। विषयों में अनुराग होने से मन चंचल बना रहता है इंद्रियां अपने विषयों मे प्रवृत्त न भी हो पर मन की गति उस समय भी विषयों के स्मरण में संलग्न रहती है । योगी को आवश्यक है कि मन को  विषय अनुराग से हटाकर आत्मा के चिंतन में लगाएं केवल आत्मा के चिंतन में ही। जब आत्मा के अतिरिक्त समस्त विषयों से हटकर मन आत्मा में एकाग्रता की स्थिति को बनाता है उसी अवस्था का नाम ध्यान है। इसमें मन बाह्य विषयों से सर्वथा रहित हो जाता है। यहाँ केवल आत्म चिंतन निरंतर निर्बाध रूप से चलता है, साधना तथा ध्यान की दृष्टि से यह चित्त की सर्वोत्कृष्ट अवस्था है क्योंकि चित्त का कार्य है किसी विषय का आलंबन लेकर उस पर चिंतन करना इस संबंध में कठोपनिषद ने कहा है  
एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ।
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते।।  (कठोपनिषद)
अर्थात समस्त आलम्बलों में ब्रह्म का आलंबन ही सर्वश्रेष्ठ है जो योगी इस आलंबन को पा लेता है वह ब्रह्मलोक में असीम महिमा को प्राप्त हो जाता है। अर्थात ज्ञानी लोगों , विद्वानों व योगियों के बीच में वह व्यक्ति श्रेष्ठ व्यक्ति कहलाता है और ईश्वर की कृपा का पात्र बन जाता है महर्षि पतंजलि के अनुसार "देश बन्धश्चित्तस्य धारणा" (योग दर्शन 3.1) साधना की सभी विधियों में ध्यान आवश्यक है पतंजलि योग अनुसार यम नियम रूपी महाव्रतो के पालन करने के पश्चात आसन सिद्ध हो जाने पर प्राणायाम के माध्यम से मन व प्राण के सभी फलों का नाश करके, इंद्रियों व मन को अपने-अपने विषयों से समेट कर, उस देश विशेष में ध्यायमान विषय को आलंबन बनाकर ज्ञान की एकाग्रता को ही ध्यान कहते हैं । महर्षि पतंजलि योग दर्शन के अष्टांग योग में ध्यान सातवां महत्वपूर्ण अंग है १ यम,२ नियम,३ आसन,४ प्राणायाम,५ प्रत्याहार पांच योग के बह्यिरंग तथा ६ धारणा,७ ध्यान,८ समाधि यह तीन अंतरंग है। साधना की सभी विधियों में ध्यान अत्यावश्यक है । ध्यान की उत्कृष्ट अवस्था ही योग अंगों में अंतिम समाधि में परिवर्तित हो जाती है। जीवन के आनंद का मार्ग ध्यान से होकर जाता है, परमात्मा तक कोई कभी पहुंचा है तो वह पहली सीढ़ी ध्यान की है। जहां धारणा, ध्यान, समाधि तीनों एकत्र हो जाते हैं  उस स्थिति को आप्त शास्त्रो ने संयम कहा हैं । शास्त्रों में इसे कहा है "त्रैयमेकत्र संयमः", "तज्जया प्रज्ञालोकः"।  जैसे-जैसे संयम स्थिर होता है उसी क्रम में  'समाधिजन्य प्रजा विशारद' अर्थात आत्मा निर्मलतर से निर्मलतम् होती चली जाती है।

ध्यान के लिए कुछ दिशानिर्देश-

▪︎ध्यान करते समय ध्यान को ही सर्वोपरि महत्व दें।
▪︎ध्यान के समय किसी अन्य विचार शुभ-अशुभ से दूर रहें। 
▪︎ध्यान का लक्ष्य ब्रह्म साक्षात्कार ही होना चाहिए।
▪︎ध्यान के समय मनवा इंद्रियों को अंतर्मुखी बनाना चाहिए। 
▪︎साधक को सदा विवेक वैराग्य भाव में रहना चाहिए।
▪︎ध्यान हेतु आहार की शुचिता एवं सात्विकता पर भी मूल रूप से ध्यान देना चाहिए। 

ध्यान के चिकित्सकीय लाभ  (Benefits of meditation)

▪︎ Controlled blood pressure.
▪︎ Better blood circulation.
▪︎ Normalized heart rate.
▪︎ Slower respiration.
▪︎ Less and anxiety, cure migraine problem.
▪︎ Reduced depression.etc.
  
"ध्यान मानव मात्र के लिए शारीरिक व मानसिक, प्राणिक, बौद्धिक, वाचिक, व्यवहारिक तथा आत्मिक रूप से हमें एक नई ऊर्जा, शक्ति, संतोष व सुख देने की पद्धति है। आजकल यद्यपि ध्यान के नाम पर अशास्त्रीय एवं  अवैदिक पद्धतियां भी प्रचलित हैं किंतु वास्तव में ध्यान उसी व्यक्ति का घटित होता है जो व्यक्ति योग के सभी नियमों का तथा अंगों का यथोचित पालन करता है।जिस प्रकार नींद की विधि तो बताई जा सकती है पर अच्छी नींद किसी को दिलाई नहीं जा सकती है यह तो मेहनत और शुभ कर्मो का परिणाम है।"~कुलदीप शिवसोम आर्य 

कपालभाति की विधि, लाभ व सावधानियो की चर्चा कीजिए।

Question.4 कपालभाति की विधि, लाभ व सावधानियो की चर्चा कीजिए।  कपालभाति की विधि :-  किसी भी ध्यानात्मक अवस्था सुखासन, पद्मासन या ...