Question.4 कपालभाति की विधि, लाभ व सावधानियो की चर्चा कीजिए।
कपालभाति की विधि :-
किसी भी ध्यानात्मक अवस्था सुखासन, पद्मासन या वज्रासन लगाकर बैठे, दोनों हाथ ध्यान मुद्रा ,ज्ञान मुद्रा में या दोनों हाथों से हम घुटने भी पकड़ सकते हैं, नेत्र कोमलता से बंद, कमर एवं गर्दन सीधी ,चेहरे पर प्रसन्नता का भाव ,शक्ति पूर्वक स्वासो को नासिका के द्वारा बार-बार बाहर फेंकते जाएं ।
प्रयास पूर्वक श्वास नहीं लेना है, स्वास स्वत:ही अंदर जाएगी। स्वास को बाहर फेंकने के साथ-साथ पेढू को रीढ़ की ओर बारंबार आकर्षित करें। एक सेकंड में एक बार श्वास को लय के साथ फेंकना एवं सहज रूप से धारण करना चाहिए। इस प्रकार आदर्श स्थिति में बिना रुके 1 मिनट में 60 बार तथा 5 मिनट में 300 बार कपालभाति प्राणायाम होता है। अपनी शक्ति और सामर्थ्य अनुसार संख्या कम या अधिक हो सकती है ,आसन प्राणायाम करते समय अपने शरीर या सांसों के साथ बिल्कुल भी खिलवाड़ ना करें।
कपालभांति के लाभ :-
कपालभांति के लाभ :-
1.शरीर में स्थित 20 प्रकार के कफ रोग पूर्णत: विनष्ट हो जाते हैं।
2.मस्तिष्क और मुखमंडल पर आभा ,ओज एवं तेज बढ़ता है।
3.कैंसर ,एड्स ,मधुमेह ,डिप्रेशन, हेपेटाइटिस ,सफेद दाग, सोरायसिस ,अत्यधिक मोटापा, इनफर्टिलिटी आदि मे लाभ होता है ।
4.फेफड़ों में रुकी हुई वायु जो साधारणतया बाहर नहीं निकलती वह भी बाहर निकल जाती है, उसके स्थान पर ऑक्सीजन श्वास द्वारा अंदर जाकर रक्त शोधन क्रिया को तीव्र बनाती है। रक्त भ्रमण भी सामान्य रूप से होने लगता है ।
5.श्वसन प्रणाली एवं नासिका द्वारों का भी शोधन होता है तथा श्वास नलिकाए लचीली बनती हैं, फलत: समग्र श्वसन प्रणाली स्वस्थ होकर अच्छा कार्य करती है।
6.विचार शक्ति ,स्मरण शक्ति को बढ़ाने की इसमें अद्भुत क्षमता है।
7. उद्विग्न मन शांत होता है।
8.समस्त कफ रोग दमा ,श्वास, एलर्जी ,साइनस आदि रोग नष्ट हो जाते हैं।
9. ह्रदय, फेफड़ा एवं मस्तिष्क के समस्त रोग दूर होते हैं।
10. मोटापा ,मधुमेह ,गैस ,कब्ज, अम्लपित्त ,किडनी तथा प्रोस्टेट से संबंधित सभी रोग ,पेट आदि बढ़ा हुआ भार, हृदय की धमनियों में आए हुए विरोध दूर होते हैं।
11. मन स्थिर, शांत तथा प्रसन्न रहता है ।नकारात्मक विचार नष्ट हो जाते हैं जिससे डिप्रेशन आदि रोगों से छुटकारा मिलता है।
12. अमाशय, अग्नाशय ,यकृत, प्लीहा, प्रोस्टेट एवं किडनी का आरोग्य विशेष रूप से बढ़ता है।
13. पेट के लिए बहुत से आसन करने पर भी जो लाभ नहीं हो पाता मात्र कपालभाति प्राणायाम के करने से ही सब आसनों से भी अधिक लाभ हो जाता है ।
14.दुर्बल आंतों को सबल बनाने के लिए भी यह प्राणायाम सर्वोत्तम है।
विशेष सावधानी :-
1.पेट की शल्यक्रिया के लगभग 3 से 6 महीने के बाद ही इसका अभ्यास किसी योग्य योगाचार्य तथा डॉक्टर के परामर्श के बाद ही करें।
2. गर्भावस्था ,अल्सर ,हर्निया, नकसीर, माइग्रेन, चक्कर आना, मिर्गी ,आंतरिक रक्तस्राव एवं मासिक धर्म की अवस्था में इस प्राणायाम का अभ्यास ना करें ।
3.ह्रदय रोगी तथा उच्च रक्तचाप से ग्रसित रोगियों को यह प्राणायाम नहीं करना चाहिए।

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